किफायतसे की गई खेती मकईकी

प्रा. डॉ. वि.सु. बावसकर (अनुवाद - डॉ. विद्युत लक्ष्मणराव कातगडे)

धरतीपर ३ रे स्थानपर यदि किसी खेतिका नाम है, तो वह है मकईकी खेतीका। ये फसल है मूलत: पेरू, इक्वाडोर, बोलीव्हिया, दक्षिणी मेक्सिको व मध्य अमरीकाकी । इसकी किसानी खाद्यान्न, गोधनचारा इनके अलावा पशुखाद्य बौर कतिपय एनी उद्योगोंहेतु कच्चे मालाके रूपमें की जाती है । दुनियामें १३२ दशलक्ष हेक्टर जमीनपर हर वर्ष प्राय: ५७० दशलक्ष टन मकई होती है । भारत मकईकी उपज लेनेवालोंमें यद्यपि ६ ठें क्रमपर है, यहाँकी उत्पादकता देखें तो हमारा क्रम दुनियामें १५ वाँ है । इससे १ तर्क लगता है कि यहाँ प्रयुक्त किस्मोंसे मिलती उपजही कम हो । देशकी ७ दशलक्ष हेक्टर भूमि पर वर्षमें कभी - न - कभी मकई ली जाती है, किन्तु इनकी औसतन उत्पादकता ४,३१८ टन / हेक्टरसे कही नीचे होती है।

मकईके अनेकविध प्रयोग : दाने , खाद्यान्न कुक्कुटपालनमें खुराक मकई - पौधके पत्ते, तने, डण्ठल, दाने उतर जानेपर शेष बची छल्ली जनावारोंके चारे के रूपमें प्रयुक्त होते रहे है । मकईके दानोंसे सदैव प्रयोग में रहें ऐसी चीजें, पशुखाद्यादि ५०० से अधिक उत्पाद हमेशा उत्पादन - प्रक्रियामें रहते हैं । इनमें तैल, शीरा (Syrup) स्टार्च, डेक्स्ट्रोज चीनीके पेय, जीवनसत्त्व, अॅमिनो अॅसिडस औषधियाँ, सेंद्रिय अम्लपदार्थ व् अल्कोहल आदि आवर्त हैं । संप्रति मकईका सर्वाधिक प्रयोग कुक्कुट - खाद्यान्नोंमें है । देशके मकई उत्पादमेंसे ६५% घरेलू प्रयोगमें, १४.५ % पशुपक्षी खाद्यान्न, १०% स्टार्स, ९% अन्य प्रक्रियाएं (तैल, इथेनॉलहेतु) व १.५ % बिजहेतु प्रयोगमें हैं ।

मकईमें विभिन्न अन्न - घटकोंका अनुपात :

मकईके दानोंमें स्टार्च ६ त्त्व %, फॅट ३.९ %, प्रथिन ८.१ - ११.५%, राख १.३७ -१.५ %, चीनी १.१६ - १.२२ % मिलते हैं । ये अनुपात विभिन्न किस्मोंमेंके उत्पादोंमे कम - अधिक होते हैं । दानोंके पीले व् सफेद रंगोंके क्रोड्के अनुसार ' अ ' जीवनसत्त्वका प्रमाण पृथक रहता है। पीले किस्ममें 'अ' जीवनसत्त्वकी मात्रा ७.०५ I. U. तो सफेदमें ०.०५ I. U. होती हैं।

मकईके प्रयोग (मकईसे बने उत्पाद)

१) कॉर्न तैल : मकईके दानोंमें ३.९% - ५.८ % स्निग्ध पदार्थ उपलब्ध हैं। इससे प्राप्त तैल दुनियाके खाद्य तेलोंमें सर्वोत्तम माना जाना हैं।

२) हाय फ्रक्टोज सायरप : प्राय: ४२% फ्रक्टोज सायरपकी मिठास सुक्रोज जैसी या इनव्हर्ट चीनी जैसी होती है। अत: अन्न उत्पादोंमें फ्रक्टोज हमेशा प्रयोग में रहेंगी । 'आयसोमरिझम तंत्र' से २ हाय फ्रक्टोज सायरप तैयार किये गए हैं । 'आयासोमरोज' ६०० जो ६०% फ्रक्टोज, तो दुसरी 'आयसोमरोज' ९०० जो ९०% फ्रक्टोज होनेकी वजह सॅकॅरिनका पर्याय बनकर उभरी हैं।

३) लॅक्टिक अॅसिड : मकईसे लॅक्टिक अॅसिड मिलता हैं। जो फलोंकी जेली, अर्क, पेय, मिष्टान्न, अचार जैसे पदार्थोमें स्वाद भरनेमें सक्षम हैं । मकई दानोंकी Wet Milling कर ग्लुटेन पाते हैं। जिसमें अन्नतत्व व प्रोटीन्स होते हैं। झेन नामक प्रोटीन Solvent Extraction & Precipitation विधिसे अलग करते हैं। दवाई गोलियोंपर आवरणहेतु झेन मौलिक है ।

अर्थशास्त्र मकाई - खेतीका : तृणवर्गीय फसलोंमेंसे कार्बोहायाड्रेट जोड़ने की क्षमता मकाईमें बेजोड़ है । गेहूँ चावल आदिके मुकाबले मुनाफेका सौदा मकईकी खेतीमें दिखता हैं।

खर्चो व् मुनाफेका तौलनिक अवलोकन

क्रम   विचारणीय मुद्दे   गेहूँ   चावल   मकई  
१   खेती - किसानीके खर्चे   ३८१५ रू.   ३५५५ रू.  ३२३५ रू.  
२   प्रति क्विंटल उत्पादन खर्चे   १६६ रू.  १४० रू.  १२९ रू. 
३   औसतन उत्पादन (किलोग्रॅम / हेक्टर)   २३१३ रू.  २५४४ रू.  २५११ रू. 
४   मुनाफा   २९९५ रू.  २७४० रू.  ३०१५ रू. 
तालिकासे स्पष्ट है कि जहाँ प्रति १०० किलोग्रॅम मकई पैदा करनेमें १२९ रूपये होते हैं । वहीं उसी मात्रामें गेहूँ व् चावलकी पैदाइशमें क्रमश : १६६ व १४० रूपये लगाने पड़ते हैं । उधर मुनाफेका मान मकाईपर ३०१५ रूपये हैं, वही गेहूँ व चावलपर ये क्रमश: २९९५ व् २७४० रूपये है । अर्थात अत्यधिक मुनाफा दिलानेमें दक्ष है मकई । गेहूँ व् चावलकी तुलनामें मकई - आवृत्त क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय स्तपर अधिक रहता है ।

मुख्य तृणवर्गीय फसलोंके बोआईमें दिखता परिदृष्य

क्रम   विच्रारणीय मुद्दे   गेहूँ   चावल   मकई  
१   जागतिक उत्पादकता (क्विंटल/ हेक्टर)   १८.७   १८.३   ३८.१  
२   भारतीय उत्पादकता (क्विंटल/ हेक्टर)   २१.२   १६.५   १५.१  
३   ऊँची उपज देनेमें सक्षम किस्मोंके चुनावका प्रतिशत   ८३%   ७२%   ३४%  


ये आँकड़े इंगित करते है कि मकईमें भारतीय उत्पादकता जागतिक उत्पदाकताके आधेसेभी कम हैं। तो इसकी वजह मकईकी ऊँची उपज देनेमें सक्षम किस्मोंके चुनावमें हम कही पिछड़ गए हैं, अर्थात मकईआवृत क्षेत्रमें विश्वभरमें पष्ठम होनेपरभी हमारी १५.१ (क्विंटल मकई / हेक्टर) ये क्षमता पारम्पारिक किस्मों में घूमते रहनेसे हुई, जो हमारा क्रम दुनियामें १५ वाँ रखवाती रही हैं।

बीजका अनुपात : रबी मौसमहेतु अधिक उत्पादन लेनेहेतु पौधोंकी संख्या ९०,००० / हेक्टर व् खरीफ मौसममें वही ६५,००० - ७५,००० / हेक्टर रखना उचित है। २ पक्तियोंके बीच फाँसला ६० - ७५ सें. मी. व २ पौधों के बीच दूरी २० सें. मी. स्वीकार्य, ताकि पौधोंकी देखभाल हो सके। ऐसे २० -२५ किलोग्रॅम बीज / हेक्टर लगेगा ।

मकईके बीजकी बीज प्रक्रिया : १ लिटर पानीमें २५ मि. लि. जर्मिनेतरके धोलमें १ किलोग्रॅम बिज १५ -२० मिनटकेलिये भिगोके रखें । जलविषयक समस्या हो, यथा - कम वर्षासे, जल उपलब्धता कम रहे, या बोआईके बाद वर्षामें विलम्बसे बीज बेकार होनेकी आशंका हो, तो आरम्भसेही जर्मिनेटरके साथ २० मि. लि. प्रिज़म के प्रयोग कम से माध्यम प्रतिकूलतामेंभी ८० - ९० % अंकुरण होनेकी स्थिती बन जाती है ।

मकई बीजकी बोआई : खरीफ, रबी व् गर्मियोंकी ऐसे ३ मौसमोंमें बोआई हो सकती है। खरिफमें मकईकी बोआई वर्षारंभसे १० -१५ दिन पूर्व (यदि जलकी वैकल्पिक व्यवस्था हो) करें, तो वर्षा के बाद की गई बोआईसे १५% बढ़ी फसल प्राप्त कर सकते हैं। शीघ्र बोआईसे १५% बढ़ी फसल प्राप्त कर सकते हैं । शीध्र बोआईकी वजह तृण प्रबंध समयसे हो सकता है । पानीकी कमीमें वर्षा आनेपर जमीन पर्याप्त नम होतेही बोआई करें, जो सही कालमें हो।

१५ अक्तूबर - १५ नवम्बरोनरान्त नीचा तापमान मकईकी वृद्धिके लिहाजसे कम हितकर होकर वृद्धिदरमें कमी दिखाती हैं। वहीं देरसे बोनेसे जमे पौधोंमें 'तांबोरा'व्याधिका प्रादुर्भाव दिखता हैं। जो सही समय पर की बोआईसे प्राप्त पौधमें नहीं होता। अक्तूबर अंततक बोआई पूरी करें, मध्य अक्तूबर का अवसर अच्छा हैं। सो खरीफ बोआई दिसम्बर अन्ततक करते हैं, किन्तु उत्पादन - स्तर सामान्यही रहता है। तापमान कम हो, तो बोआई पंक्तिके ढलानमें गहरी हो, दिसम्बर बाद सूर्य दक्षिणायनसे गुजरता है, तो पंक्तियाँ पूर्व - पश्चिम आरेखित कर, दक्षिण की ओर गहराईमें बोआई हो, उत्तमकोटिका सूर्यप्रकाश पाकर पौधोंकी वृद्धि बेहतर होगी।

मकई - खेतीमें खादें : जमीनके दीर्धकालिक हितको देखते हुए, मकईको यथासंभव अधिक सेंद्रिय खादोंपरही बढ़ानेकी नीति रखें । मकई कम आयुचक्रकी किन्तु 'अत्यधिक भुक्कड़' आचरण कराती फसल है। इसे बड़ी मात्रामें खादकी जरूरत होती है। खेत तैयार करते हुए गोबराकी खाद १५ -२० टन / एकड़ दें, फिर बोआईके समय कल्पतरू सेंद्रिय खाद (२-३ बॅग / एकड़) १ -१ चम्मच हर बीजारोपण स्थल' पर डालें । इसके अलावा रासायनिक खादेंभी जरूरी हैं। सो पूरी करें। बागायती खेतीमें नत्र १२० किलोग्रॅम, स्फुरद ६० किलोग्रॅम, पालाश ४० किलोग्रॅम/ हेक्टर दें। वर्षामें बढती मकईहेतु नत्र ७० किलोग्रॅम, स्फुरद ३५ किलोग्रॅम, पालाश २५ किलोग्रॅम/ हेक्टर मिले।

मकई - खेतीमें सूक्ष्म अन्नतत्त्व : फसलकी दृष्टिसे मकई उपजमें झिंक सल्फेट का प्रयोग मुफिद है, २० किलोग्रॅम / हेक्टर खेत जोतते हुए झिंक सल्फेट दें, किन्तु ये देते समय स्फुरदयुक्त अन्य रासायनिक खाद के साथ न (स्फुरदके साथवाले अन्य अन्नतत्त्व जमीनमें झिंकसे ज्यादा घुलनशील हों, तो झिंक उपस्थित होकर भी मिट्टीमें अनुपलब्ध रहेगा) मिलाया जाए।

उच्चतर कोटिके उत्पाद हेतु 'सप्तामृत' छिड़काव

१) अंकुरणके १५ - २१ दिनोंमें सप्तामृत २५० मि. ली. + हार्मोनी १५० मि. ली. का घोल १०० लिटर पानीमें छीडकाव करें।

२) अंकुरण के २१ -४० दिनोंमें सप्तामृत ५०० मिली + हार्मोनी २५० मिली का घोल १५० लिटर पानीमें छिडकाव करें।

३) अंकुरणके ४० - ५५ दिनोंमें सप्तामृत ७५० मि. ली. १ लिटर + हार्मोनी ३०० - ४०० मि. ली. का घोल २०० लिटर पानीमें छिडकाव करें। इस तकनीकके प्रयोग से मकई के कोटि व राशिमें वृद्धिका अनुभव कई कृषकोंने लिया हैं।

लाल बत्ती : विगत पाँचसात वर्षांसे महाराष्ट्र के अनेक भागों, विशेषत: खानदेश, मराठवाडा , पश्चिम महाराष्ट्र आदि क्षेत्रोंमें मकईकी खेती तेजीसे बढती जा रही है। खरीपमें खेतीसे अक्टूबरमें ये फसल ले ली जातो है। जो कभी ३ - ४ रूपये / किलो ग्रॅम मिलती रही, वाही मकई अब १० -१२ रूपये / किलोग्रॅम हो गई है। पुन: २५ - ५० क्विंटल/ एकड पैदावर लेनेवाले कृषकभी हैं । अत: कम समयमें भरपूर आय देती मानकर मकईकी खेतिमें आवर्त जमीन बढ़ती जा रही है।

युरोप, अमरिकी खण्डोंमें आवर्त राष्ट्रोंमें ओझोनकी मात्रामें कमी करती, हानिप्रद , व्ययसाध्य तकनीक भारतमें संचालित व आर्थिक आश्रयके सहारे प्रसृत की गई । इस परिदृष्य में यहाँ मकईने आसरा पाया। फसलोंके उलटफेर करनेमें कृषक कपासके बाद मकई लेने लगे हैं। यद्यपि मकई १ तृणवर्गीय फसल हैं। तथापि वह प्रत्येक आयुचक्रमें 'अत्यधिक भुक्कड़' तरीकेसे पेश आती हैं, ये तथ्य दुनियामें जानापहचाना है। गन्नेकी खेतीमें अधिक पानी व रासायनिक खादोंके बलपर कुछ दर्जोंमें फसल वृद्धि हासिल हुई थी, किन्तु अवशेष जमीनमें सदाकेलिये डटे रहनेसे जयादा पानी व् रासायनिक खादोंके होते हुए अब पैदावार ६० टनसे ३० टनपर उतर आई है। यह अवनति शासनकी समझमें आते आते १५ वर्ष लगे, तबतक जमीनका स्तर औरभी घटता रहा, साथही इन समस्याओंपर उपाय खोजनेमें अमुल्य समय व धन व्यय हुआ।

फसलोंके उलटफेर करना, खेतीका नियोजन, सेंद्रिय खादों व् हरित खादों का प्रयोग यदि न किया गया, तो संभव हैं। मकईमें हालात गन्नेकी खेतीसे आयी दशासेभी विपरीत होंगे । मकईसे कृषक तात्कालिक रूपमें लाभान्वित होंगा, लेकिन निरंतर मकईके मोहजालमें फाँसे रहनेसे जमीनकी दीर्घकालिक बनावटही बदल / बीगड जाए । सेंद्रिय उर्वरापन, जेविक उर्वरापन, रासायनिक उर्वरापन थमकर वेही भारतीय भूमि व् खेतीकेलिये अभिशाप बनेंगे । ऐसी लम्बी, घातक व्याधि लगनेके बाद मूक वसुंधरा की देहबोली समझनेमें हमारे वैज्ञानिक आगामी १० -१५ वर्ष और बिताएंगे । फिर सदाही खेतोंमें खटते कृषककी समझको क्या दोष दें? एस वजह रासायनिक खादोंसे अधिक भरोसा गन्नेकी रूखी खली, खेतका कूड़ाकरकट, भाँति - भाँतिकी हरित खादें, केचुएकी खाद और कल्पतरू सेंद्रिय खादोंपरही निर्भर होनेकी सोचें तो जमीनका स्वास्थ्य यथासंभव दीर्धकालतक बना रहनेकी बात चल पडे । इसके बिना इसी सूचनाको चाहें । तो चेतावनी जानें, खतरेकी घण्टी समझें या फिर लाल बत्ती ।

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