आलू की खेती

आलू सोलेनेसी कुल तथा सोलेनम प्रजाति से सम्बन्धित है। सोलेनम वंशज को आगे कई उपवंशजों में वर्गीकृत किया गया है जिनमें से एक पोटैटो है एवं उसमें दो हजार से अधिक किस्मों या प्रजातियों का वर्णन है जो कन्द पैदा करने में सक्षम है। सोलेनम कुल को पुन: कई प्रजातियों में बांटा गया है जिनमें से एक प्रजाति ट्यूबरोसा है। ट्यूबरोसा श्रेणी में जंगली व खेती योग्य लगभग ५४ उपवंशज सम्मिलित हैं। इनमें से एक श्रीणी सोलेनम ट्यूबरोसम (एस.ट्यूबरोसम) है, जिसे पुन: दो प्रजातियों ट्यूबरोसम व एण्डीजीना में बांटा गया हैं। फसल उगाने के लिए आमतौर पर ट्यूबरोसम प्रजाति का प्रयाग किया जाता है। एण्डीजीना प्रजाति का प्रयोग भी फसल उगाने के लिए किया जाता हैं परन्तु इसकी खेती केवल मध्य तथा दक्षिण अमरीका में ही की जाती है। आलू का उद्गम स्थान लैटिन अमरीका है। जिसमें वेनेजुएला के एण्डीएन, कोलम्बिया, एक्वेडर, पेरू, बोलीविया और अर्जेन्टीना तक फैला विस्तृत भूभाग तथा दूसरा मध्य मैक्सिको का पूरा इलाका आता है।

आलू के गुण : आलू अपने निम्न कई गुणों के कारण अन्य मुख्य खाद्य फसलों की अपेक्षा अच्छा माना जाता है ।

आलू पौष्टिक आहार है। इसमें शर्करा (कार्बोहाइड्रेट्स), खनिज, विटामिन सी, बी समूह के कई विटामिन, उच्च कोटि के पाचक रेशे इत्यादि होते हैं। १०० ग्राम ताजे आलू में ९७ किलो कैलोरी ऊर्जा होती है। जो अनाजों से प्राप्त कैलोरी से काफी कम है। परन्तु प्रति हैक्टर इकाई की दर से यह आलू में अन्य अनाजों की तुलना में अधिक होती है। पकाने पर इनमें विद्यमान ऊर्जा व अन्य पोषक गुणों में काफी कमी हो जाती है। इसका कारण है कि उबालने पर आलू कम पानी सोखता है जबकि अनाज अपने

कुछ मुख्य खाद्य फसलों में पोषक मूल्य (प्रति १०० ग्राम खाद्य हिस्से में)

पोषक तत्त्व का नाम   आलू   गेहू   चावल   मक्का   सोयाबीन  
खाद्य प्रोटीन (प्रतिशत)   ८५.००   १००.००   १००.००   १००.००   १००.००  
नमी (ग्राम)   ७४.७०   १२.८०   १३.७०   १४.१०   ८.१०  
प्रोटीन (ग्राम)   १.६०   ११.८०   ६.८०   ११.१०   ४३.२०  
वसा (ग्राम)   ०.१०   १.५०   ०.५०   ३.६०   १९.५०  
खनिज(ग्राम)   ०.६०   १.५०   ०.६०   १.५०   ४.६०  
रेशा (ग्राम)   ०.४०   १.२०   ०.२०   २.७०   ३.७०  
शर्करा वर्गीय तत्व (ग्राम)   २२.६०   ७१.२०   ७८.२०   ६६.२०   २०.९०  
ऊर्जा (ग्राम)   ९७.००   ३४६.००   ३४५.००   ३४२.००   ४३२.००  
कैल्शियम (मिलीग्राम)   १०.००   ४१.००   १०.००   १०.००   २४०.००  
फास्फोरस (मिलीग्राम)   ४०.००   ३०६.००   १६०.००   ३४८.००   ६९०.००  
लौह तत्त्व (मिलीग्राम)   ०.७०   ४.९०   ३.१०   २.००   ११.५०  
कैरोटीन (मिलीग्राम)   २४.००   ६४.००   ०.००   ९०.००   ४२६.००  
थियामिन (मिलीग्राम)   ०.१०   ०.४५   ०.०६   ०.४२   ०.७३  
रिबोफ्लेविन (मिलीग्राम)   ०.०१   ०.१७   ०.०६   ०.१०   ०.३९  
नियासिन (मिलीग्राम)   १.२०   ५.५०   १.९०   १.८०   ३.२०  
विटामिन सी (मिलीग्राम)   १७.००   ०.००   ०.००   ०.००   -  


भार से दो से तीन गुना अधिक पानी सोख लेते हैं। इसके अतिरिक्त विशेष बात यह है कि छिलके सहित आलुओं को उबालने पर विटामिन पानी में नहीं घुलते अत: उनका ऱहास नहीं होता है। शुद्ध प्रोटीन के उपयोग या आलू के जैविक मान के मामले में आलू. प्रोटीन का जैविक मान अण्डे कि प्रोटीन के लगभग ७१ प्रतिशत जैविक मान के बराबर, परन्तु गेहूं, मक्का, मटर तथा सेम के प्रोटीन जैविक मान से अधिक होता है। गेहूं के प्रोटीन का जैविक मान ५३ प्रतिशत,मक्का का ५४ प्रतिशत, मटर का ४८ तथा सेम का ४६ प्रतिशत होता है। हां आलू प्रोटीन के जैविक मान की तुलना गाय के दूध में विद्यमान प्रोटीन के जैविक मान, जो कि ७५ प्रतिशत होता है, से की जा सकती है।

* आलू के किस्मे : वर्तमान में कुफरी सिन्दूरी, कुफरी चंद्रमुखी, कुफरी ज्योति, कुफरी लवकार, कुफरी बादशाह, कुफरी बहार, कुफरी लालिमा, कुफरी स्वर्ण, कुफरी जवाहर, कुफरी सतलुज, कुफरी अशोक, कुफरी पुखराज, कुफरी गिरिराज, कुफरी आनंद, कुफरी चिप्सोना -१, कुफरी चिप्सोना -२, कुफरी अरूण, कुफरी हिमसोना, कुफरी सदाबहार, कुफरी गिरधारी, कुफरी ख्याति जैसी २७ किस्में खेती के लिए अधिसूचित की गईं है। इस समय भारत के कुल कृषि क्षेत्र के ९५ प्रतिशत हिस्सों में आलू की इन्ही किस्मों की खेती की जा रही है। इनमें से पहाड़ी इलाकों व् पश्चिम बंगाल में कुफरी ज्योति, शैलजा, कुफरी हिमालनी, गुजरात राज्य में कुफरी बादशाह तथा उत्तर प्रदेश में कुफरी बहार, कुफरी अरूण किस्में अधिकांश क्षेत्रो में उगाई रही हैं।

१) कुफरी सिन्दूरी : आलू की यह किस्म कुफरी रेड व् कुफरी कुन्दन के जैसे संकरण से विकसित की गई है। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों, विशेषकर उत्तर प्रदेश व बिहार राज्यों, जहा पर लाल छिलके वाले आलूओं को पसन्द किया जाता है, के लिए यह किस्म वर्ष १९६७ में जारी की गई थी। यह किस्म लगभग ११० - १२० दिनों में तैयार होती है। इस किस्म के पौधे लम्बे, सीधे, खुले हुए, पुष्प एवं तने मोटे होते हैं। जिन पर हल्के फीके लाल - बैंगनी रंग के फूल लगते हैं और उनका शीर्ष सफेद होता है । इसके कन्द आकार में मध्यम, गोल तथा लाल छिलके वाले होते हैं जिनकी आंखे मध्यम गहरी धंसी हुई होती हैं। इस किस्म में अगेता झुलता रोग के प्रति माध्यम स्तर की प्रतिरोधिता है। पत्ती सकुंचन (मोडक) विषाणु रोग के प्रति सहनशील होने के कारण इसकी बीज विकार ह्रास दर धीमी होती है। उसकी औसटी पैदावार प्रति हैक्टर ३० -३५ टन है। कम उपजाऊ भूमि में भी इसकी अच्छी पैदावार होती है।

२) कुफरी चन्द्रमुखी : यह किस्म, हाइब्रिड ४४८५ के सीडलिंग व् कुफरी कुबेर के संकरण से वर्ष १९६८ में विकसित कि गई थी। यह किस्म उत्तर भारत के मैदानी व पठारी इलाकों के लिए उपयुक्त है। मात्र ७० - ९० दिनों में तैयार होने वाली इस किस्म के मध्यम आकर के फैलावदार, खुले, पुष्ट तथा घने पौधे होते हैं। पौधें पर हल्के नीले बैंगनी फूल लगते हैं। बड़े आकार, सपाट अंखुओं वाले इसके सफेद रंग के कन्द काफी आकर्षक लगते हैं। यह किस्म मुख्य रोगों की प्रतिरोधक नहीं है। फिर भी यह आलू के फ्लेक्स, आलू का आटा, फ्रेंच फ्राइज व आलू के सूखे उत्पादन बनाने के लिए उपयुक्त है। इसकी औसत पैदावार प्रति हैक्टर २० - २५ टन है।

३) कुफरी लवकार : यह किस्म एडिना व सारकोव नामक किस्मों के संस्करण से तैयार की गई है। इसे वर्ष १९७२ में कर्नाटक, मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र के पठारी इलाकों के लिए जारी किया गया। ७५ - ८० दिनों में तैयार होने वाली इस किस्म के पौधे लम्बे, सीधे, मध्यम पुष्ट तथा घने होते हैं। जिन पर सफेद फूल लगते हैं। इसके कन्द सफेद, मध्यम से बड़े आकर के गोल अण्डाकार होते हें जिसके अंखुए सपाट तथा भौहें निकली हुई प्रतीत होती हैं। माध्यम मैदानी क्षेत्रों में उगाने पर किस्म फ्लैक्स, आलू का आटा, चिप्स व सूखे उत्पादन बनाने के लिए उपयुक्त है। आलू के मुख्य रोगों के प्रति सुग्राही यह किस्म प्रति हैक्टर २० -२५ टन पैदावार देने में सक्षम है।

४) कुफरी जवाहर : आलू की यह किस्म, कुफरी नीलमणि और कुफरी ज्योति किस्मों के संकरण से विकसित की गई है। यह किस्म, वर्ष १९९६ में पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, गुजरात एवं कर्नाटक के पठारी इलाकों के लिए जारी की गई। शीघ्र (७० - ९० दिनों में) तैयार होने वाली इस किस्म के पौधे छोटे, सीधे, पुष्ट व घने होते हैं जिन पर सफेद फूल लगते हैं। इसके कन्द माध्यम आकार के सफेद, गोल अण्डाकार व अंखुए सपाट होते हैं। यह किस्म पिछेता झुलसा रोग के प्रति मध्यम प्रतिरोधक होने के साथ - साथ यान्त्रिक खेती के लिए भी उपयुक्त है तथा इसकी प्रति हैक्टर २५ - ३० टन पैदावार होती है।

५) कुफरी पुखराज : आलू की यह किस्म क्रेग डिफाएंस व JEx/B-६८७ के संकरण से विकसित की गई तथा वर्ष १९९८ में इसे उत्तर भारत के मैदानी व पठारी इलाके के लिए जारी किया गया। आलू की यह किस्म शीघ्र (७० - ९० दिनों में) तैयार हो जाती है। इसके पौधे लम्बे, झुके हुए, मध्यम पुष्ट तथा घने तथा सफेद फूल वाले होते हैं। इसके कन्द बडे, सफेद रंग के अण्डाकार व् कुछ दबे और अंखुए सपाट होती हैं. धूप के सम्पर्क में आने से इसके कन्दों का रंग हल्का बैंगनी हो जाता हैं। आलू की यह किस्म अगेता झुलता की प्रतिरोधी व् पिछेता झुलसा के प्रति सामान्य या हल्की प्रतिरोधी है। इस किस्म की प्रति हैक्टर औसत पैदावार ३५ - ४० टन होती हैं।

६) कुफरी पुष्कर : उत्तर भारत के मैदानी इलाकों तथा पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश व महाराष्ट्र के लिए उपयुक्त आलू की यह किस्म QB/A ९-१२० x स्पाट्ज संकरण से विकसित कर वर्ष २००४ में जारी की गई। मध्यम अवधि (९० - ११० दिनों) में तैयार होने वाली इस किस्म के पौधे मध्यम लम्बे, सीधे, घने तथा गठीले होते हैं और इन पर सफेद फूल लगते हैं। इसके कन्द मध्यम गोल - अण्डाकार सफेद व अंखुए मध्यम गहरे तथा गूदा हल्का पीला होता है। ३० ते ३५ टन पैदावार देने वाला वाली यह किस्म पिछेता व् अगेता झुलसा प्रतिरोधक है।

उत्पादन क्षेत्र :

१) उत्तर - पश्चिम मैदानी क्षेत्र : इस क्षेत्र में पंजाब, हरियाणा व् राजस्थान राज्य आते हैं। यहां आलू का उत्पादन अगेती पतझड (सितम्बर - नवम्बर), पतझड (अक्तूबर - जनवरी/फरवरी) व् वसन्त (अप्रैल/मई) तीन मौसमों में किया जाता हैं। सर्दियों में यहां का तापमान माहूं की तीव्र बढवार के अनुकूल नहीं होता इसलिए यह क्षेत्र बीज आलू की खेती के लिए उपयुक्त है। यद्यपि यहां सितम्बर माह के दौरान दिन का तापमान अधिक होता है, फिर भी यहां आलू की अगेती फसल सितम्ब - नवम्बर के दौरान ली जाती है। आलू की अगेती फसल की किस्म में परिपक्वता अवधि कम अर्थात वह शीघ्र तैयार होने वाली, जल्दी कन्दीकरण, उच्च तापमान सहनशीलता, बीज विकृति दर धीमी व् पिछेता झुलसा प्रतिरोधिता के गुण होने चाहिए। आलू की मुख्य फ़सल की किस्म में पाला प्रतिरोधिता के गुण का होना एक अतिरिक्त लाभ है।

२ ) पश्चिम - मध्य मैदानी क्षेत्र : इस क्षेत्र में पश्चिम - मध्य उत्तर प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश के उत्तर - पश्चिमी जिले में आते हैं। यहां सर्दियों या पतझड़ के अक्तूबर से जनवरी/फरवरी में आलू की ९० - १०० दिनों में तैयार होने वाली फ़सल उगाई जाती है। इन दिनों में दैनिक प्रकाशावधि कम (लगभग १० घण्टे ) होती है और आमतौर पर यह क्षेत्र आलू के मुख्य रोगों से मुक्त है। यहां आलू के मुख्य पिछेता झुलसा रोग का भी नियमित असर नही होता। इस क्षेत्र में छोटे दिनों के अनुकूल, शीघ्र कन्दीकरण वाली, पिछेता झुलसा प्रतिरोधी तथा धीमी बीज विकृति दर वाली आलू की किस्में उगाई जानी चाहिए।

३) उत्तर - पूर्वी मैदानी क्षेत्र : इस क्षेत्र में असम, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, पूर्वी उत्तर प्रदेश व् मध्य प्रदेश के उत्तर - पूर्वी व् छत्तीसगढ के पूर्वी जिले आहे हैं। पश्चिम - मध्य मैदानी क्षेत्र के साथ इस पूरे क्षेत्र को देश का आलू कटोरा या पोटैटो बाउॅल के नाम से भी जाना जाता है। इस पूरे क्षेत्र में देश के कुल आलू उत्पादन का तीन - चौथाई हिस्सा पैदा होता है। यहां आलू की फ़सल नवम्बर से फरवरी/मार्च के दौरान सर्दियों के छोटे दिनों में लगाई जाती है। यहं उगाई जाने वाली आलू की किस्मों में छोटे दिनों में तैयार होने में समक्ष, शीघ्र तैयार या कन्दीकरण तथा पिछेता झुलसा प्रतिरोधिता के गुण होने चाहिए। उत्तर - पूर्वी मैदानी इलाकों में लाल छिलके वाली किस्में पसन्द की जाती हैं।

* जल प्रबन्धत : मिट्टी की जल धारण क्षमता के आधार पर अध्ययन करके सही ढंग की सिंचाई अनुसूची तैयार की गई। इस विधि के अनुसार जब खेत में पानी का स्तर एक निश्चित स्तर से निचे चला जाए तो जड़ तन्त्र के आसपास पर्याप्त मात्रा में खेत की जल धारण क्षमता के अनुसार इतनी सिंचाई की जाए ताकि जड़ तन्त्र के पास नमी बानी रहे। मिट्टी की नमी के आकलन के लिए टेन्सियोमीटर का प्रयोग किया जाता है। खेत में नमी बनाए रखने के लिए १५ -२२ सेंटीमीटर गहराई तक ०.२ ते ०.३ bar तक सिंचाई करने से अधिकतम पैदावार होती है। इस प्रकार सिंचाई करने से पूर्व भी जड़ तन्त्र क्षेत्र के आसपास ६३ प्रतिशत नमी रहती है। सिंचाई अन्तराल ७ -१२ दिनों का होता है। उपलब्ध मृदा में नमी का स्तर १५ ते ३० प्रतिशत घट जाने तक की सिंचाई करने की रीति से उपरोक्त विधि बेहतर है।

फव्वारा या स्प्रिंक्लर सिंचाई प्रणाली :

पहाड़ी और पठारी इलाकों की टेडी - मेडी भूमि की बनावट कहीं काफी नीची गहरी और कहीं काफी ऊंची होने के कारण समतल नहीं होती। दुसरे इन क्षेत्रों की मिट्टी कहीं बलुई होती है जिनमें पानी उद्ग्रहणका स्तर कम होता है और कुछ क्षेत्रों में मिट्टी की संरचना या बनावट काफी बढिया होने के कारण पानी उद्ग्रहण स्तर अधिक होता है। तीसरे इस पर लागत तो अधिक आती है परन्तु पानी का प्रयोग कम होता है। यदि स्प्रिंक्लर विधि का प्रयोग किया जाए तो मिट्टी चढाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। साथ ही पौधों से पौधों की दूरी भी कम राखी जा सकती है। इस प्रणाली से सिंचाई करने से जल की ४० प्रतिशत बचत हो सकती है। किन्तु इस प्रणाली में प्रयुक्त होने वाले पाइप, राईजर और प्रेशर पम्प महंगे होते हैं। इसके अतिरिक्त इस प्रणाली को सही ढंग से लगाने तथा चलाने के लिए तकनीकी ज्ञान भी आवश्यक है.

टपक या ड्रिप सिंचाई प्रणामी : ड्रिप सिंचाई प्रणाली का विकास आधुनिक युग की एक मुख्य उपलब्धि है। इसे टपक या बूंद - बूंद पानी गिरने की सिंचाई करने का तरीका भी कहते हैं। इसमें जड़ तन्त्र क्षेत्र को हल्का बूंद - बूदं जल टपका कर सिंचित किया जाता है। नालियों में सिंचाई करने की अपेक्षा कम गहराई तक पानी के रिसाव होने के साथ - साथ वाष्पण से कम नुकसान होता है। आवश्यकतानुसार थोड़े - थोड़े अंतरालों पर पानी की कमी को पूरा करने के लिए सही मात्रा में सिंचाई की जा सकती है। इस तरीके में न केएल पानी की अनुकूलतम मात्रा का प्रयोग, किया जा सकता है वरन प्रयुक्त जल की मात्रा अमूमन हर दिन आवश्यक जल की मात्रा के बराबर होती है। हर रोज सिंचाई करने से मिट्टी में नमी बनाए रखने में सहायता मिलती है।

कीट :

१) भृंग (बीटल ) : दक्षिण अमेरिका के समुद्र तल से २००० ते ४००० मीटर ऊंचे कुछ क्षेत्र में एण्डीन पोटैटो लेटेन्ट वायरस (पीएलआरवी) पाया जाता है। इसके रोग कारक पौधों के सम्पर्क तथा आलू के भृंग (इपीट्रिक्स स्पे.) के साथ - साथ सत्य आलू बीज से संचारित होते हैं।

एण्डीज पोटैटो मोटल वायरस (एपीएमवी) एण्डीज के क्षेत्रों में पाए जाते है. कम तापमान की परिस्थितियों में ये बहुत तेजी से बढ़ते हैं। सम्पर्क में आने से भी उनका प्रसार होता है। इसके साथ ही इनका संचरण लीफ बीटल की डायबोर्टिका प्रजाति से भी होता है।

२) पात फुदका (लीफ हॉपर) : आलू का पीला बौना वायरस (पीवाईडीवी) एक मात्र विषाणु पात फुदका जनित आलू विषाणु से फैलता है। पीवाईडीपी के दो घनिष्ठ संबंधित व् पृथक रूप हैं। इनमें से एक का काफी संचरण पात फुदका की एसीराटगालिया प्रजाति के साथ - साथ एगे लिया सगुइनोलेन्टा से होता है जबकि एगेलिया से कम होता है। बहुत से अन्य विषाणुओं का संचरण एगेलिया कॉनट्रीक्टा तथा एगेलिया क्लेड्रीपंक्टाटा द्वारा होता है। वायरस वाहकों का न्यूनतम निषेचन काल ४ - ५ दिन का होता है। वयस्क पात फुदका की अपेक्षा इसके शिशुओं द्वारा वायरस का संचरण अधिक होता है.

३) थ्रिप्स : टोमेटो स्पॉटेड विल्ट वायरस (TOSWV) बनवावीरिड़ी और जीनस टोस्पोवायरस परिवार से सम्बन्धित है। विषाणुओं का ऐसा समूह है जिनका संचरण थ्रिप्स द्वारा होता है। ये ७९ - ९० नैनोमीटर व्यास वाले गोल विषाणु होते हैं। केवल शिशु कीट द्वारा ही विषाणु अर्जित होता है। जैसे ही लार्वा अण्डों से निकलते हैं। लार्वा अपना भोजन ग्रसित पौधे से ग्रहण करते हैं। लेकिन विषाणुओं की कीट में ३ - १० दिनों के गुप्तवधि होने के कारण विषाणुओं का संचरण वयस्क थ्रिप्स द्वारा होता है। गुप्तावधि के दौरा विषाणु, वाहकों में गुणित हो जाते हैं तथा अधिक तीव्रात से थ्रिप्स के भीतर जीवन - पर्यन्त पुनर्वृति करते रहते हैं। लेकिन टोप्सोवायरस सन्तति में पारअण्डाशयी (Transovarialy)माध्यम से नहीं पहुंच पाते।

उपोष्ण देशों में आलू की अगेती फसल में तना क्षय का मुख्य कारक टोस्पोवायरस माना जाता है। इस विषाणु से कई बार आलू की फसल को भारी नुकसान हो जाता है। इसके लक्षणों में आमतौर पर पत्तियों, तनों और पर्णकों में क्षय दिखाई देता है। इससे पौधे का रंग फीका पड़ जाता है। इसकै अतिरिक्त छल्लेनुमा (Ring Pattern ) निशान, चितकबरापन (Mottling) स्थानीय क्षत पर सफेदी तथा ठिगनापन (Stunting ) के लक्षण भी दिखाई देते हैं। ये लक्षण पौधों के वय - काल, पोषी पौधों तथा वातावरण के अनुसार अलग - अलग भी हो सकते हैँ। विषाणु ग्रसित पौधे के कन्द किस्मानुसार या तो सामान्य दिखाई देते हैं या फिर विकृत आकर में टेड़े - मेड़े, चिटके अथवा आन्तरिक ऊतकक्षयी धब्बे वाले दिखाई पड़ते हैं। आलू में विषाणु संचरण मुख्यत: थ्रिप्स पाल्मी द्वारा होता है।

४) सफ़ेदी मक्खी : सफ़ेदी मक्खी, शूकिका द्वारा वल्कल से भोजन प्राप्त करती है। विषाणु प्राप्त करने के साथ - साथ जैमिनी वायरस को स्थायी तथा चक्रीय ढंग से संचरित करने के लिए यह पत्तियों के ऊतकों की अन्त: कोशिकाओं से गुजरती हुई वल्कल तक पहुंचती है। अधिकतर जैमिनी वायरसों के संचरण के लिए २ - २४ घण्टे तक भोजन प्राप्त करने के बाद २ - ३ दिन की निवेशन अवस्था अनुकूलतम रहती है। आमतौर पर संचरण ४ - १० घण्टे की अव्यक्त अवधि के बाद हो जाता है। अर्जन के पश्चात सफ़ेद मक्खी ५ - २० दिनों तक विषाणुओं को संचरित करती रहती है। परन्तु धीरे - धीरे इसकी संचरण क्षमता घटती जाती है। सफेद मक्खी (बेमीसिआ टबेसाई) आलू के डिफोर्मिग मोजेक, पोटैटो यलो मोजेक (PALCV) इत्यादि विषाणु स्थायी रूप से संचरित करती है।

५) सूत्र कृमि : क्योंकि सूत्रकृमि बाह्य परजीवी (एक्टोपैरासाइट्स ) होते हैं इसलिए ये अपन भोजन पोषी पौधों के ऊतकों के भीतर शूकिका में घुसकर जड़ो से ग्रहण करते हैं। सूत्रकृमियों से संचरित विषाणुओं को नेपो वायरस और टोबा वायरस जैसे दोन उपसमूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है। नेपा वायरस सममित्तीया कण होते है जबकि टोब्रा वायरस लम्बे होते हैं। तीनासें टोब्रा वायरसों का संचरण सूत्रकृमियों द्र्वारा होता है, जबकि कोमविरिड परिवार के नेपो वायरस का संचरण गोलकृमियों द्वारा होता है। टोब्रा विषाणु ओं के जीनोम में दो RNA होते हैं। प्रत्येक जीनोम में सिंगल स्ट्रेन्डेड RNA होता है। बीमार संचरित पौधे के हिस्से को एक बार खाने मात्र से ही सूत्रकृमि अधिक तीव्र हो जाते हैं। सूत्रकृमियों का विषाणु स्रोत या स्वस्थ पौधे से भोजन अर्जन करने की अवधि जितनी अधिक होगी, विषाणु संचरण की दक्षता भी उतनी अधिक होगी। किसी विषाणु का सूत्रकृमियों में बने रहना संचरण और उसके विस्तार को प्रभावित करता है। एक्सीफीनेमा और टाइकोडोरस प्रजाति में विषाणु कई माह तक जीवित रहते हैं। टोमैटो ब्लैक रिंग नेपो वायरस, लोंगीडोरस प्रजाति में केवल ८ सप्ताह तक ही जीवित रहता है।

बीज संचरित विषाणु : पोटैटो स्पिंडल ट्यूबर वायरायड एक ऐसा वायरस है जो फसल का प्राकृतिक तौर पर संचरण करता है। यह विषाणु काफी संक्रमित, चक्रीय, एकल तत्वी, गौण संरचन वाला अरक्षित होता है। आमतौर पर इसमें ३५९ या कभी - कभी ३५८ या ३६० नाभिक होते हैं। यह सत्य बीज द्वारा अधिक (यहां तक कि १०० प्रतिशत) संचरित होता है। यह पराग तथा अण्ड़प दोनों में घुस जाता है।

६) माहू या एफिड : आलू की फ़सल को नुकसान पहुंचाने वाले कई प्रकार के विषाणु हैं। इसमें से अधिकतर का प्रसार कृषि - जलवायु पर आधारित कई रोग वाहकों से होता हैं। आलू की फ़सल को नुकसान पहुंचाने वाले मुख्य विषाणुओं में आलू के पत्ती मोड़क (PLRV) और आलू का वाई विषाणु (PVY) हैं। इनका प्रसार महू एफिड या माइजस परसिकी सुल्जर द्वारा होता है। इसके अतिरिक्त पी. वी. एम. जंगली आलू मोजाइक जैसे विषाणु भी माहू द्वारा फैलते हैं।

विश्व भर में माहू की ४५०० से अधिक प्रजातियां हैं जिनमें से लगभग ६७५ प्रजातियां भारत में पाई जाती हैं। इनमें से माइजस परसिकी और एफिस गोसिपई आलू विषाणु रोगों की मुख्य वाहक हैं। इनसे ग्रसित बीज आलू का प्रयोग करने से उत्पादन में भारी कमी होती है।

महू चेतावनी प्रणाली की व्यवस्था :

अ) जल ट्रैप विधि : माहू की क्रियाशीलता जांचने की यह एक सरल, सस्ती और सुनिश्चित विधि है। यह माहू पाश ४६ x ७ x २६ सेंटीमीटर आकर की एक आयताकार ट्रे होती है जिसका अन्दर का तला पीले रंग से पोत दिया जाता है। इस आयताकार ट्रे में पानी भर दिया जाता है। जिससे पीले रंग की और आकर्षित होकर माहू पानी में फंस या गिर जाते है।

ब ) चिपचिपा ट्रैप : यह बेलनाकार पीले रंग से पोता हुआ चिपचिपा माहू पाश ३० x १३ सेंटिमीटर आकर का होता है। जिस पर चिपचिपा ग्रीस लगा दी जाती है। यह यन्त्र माहू के बारम्बारता के आंकड़े प्राप्त करने के लिए अधिक उपयोगी होता है।

रोग : फफूंद जनित रोग : आलू के फफूंद जनित मुख्य रोग निम्नलिखित है :

१) पिछेता झुलसा : यह रोग फ़ाइटोफ्थोरा इन्फेस्टांस नामक फफूंद से लगता है। यह उपोष्णा इलाको में आलू की फ़सल को नुकसान पहुचाने वाला मुख्य रोग है। इस रोग की प्रबलता समशीतोष्ण इलाकों की अपेक्षा उपोष्ण इलाकों में कम होती है। आलू की फ़सल पर इस रोग का प्रभाव कम या अधिक होता रहता है। पहाड़ी इलाकों में तो आलू की फसल पर पिछेता झुलसा हर वर्ष भयानक रूप धारण करता है जिसके कारण पूरी फ़सल तैयार होने से पहले ही बर्बाद हो जाती है.

लक्षणे : पौधे के सभी भाग जैसे पत्तियां, तने, डण्ठल और कन्द इस रोग से प्रभावित होते हैं। पत्तियों पर हल्के पीले - हरे, अनियमित, पानी में भीगे हुए धब्बों के रूप में यह रोग दिखाई देता है। आरम्भिक अवस्था में ये धब्बे पत्तियों के सिरे और किनारों पर पाए जाते है। यदि मौसम में नमी बहुत अधिक हो तो ये धब्बे बहुत तेजी से बढते हैं और बीच से काले या भूरे हो जाते हैं। पत्तियों की निचली सतह पर गले हुए भाग के चारों ओर बारीक सफेद रंग की फफूंद दिखाई देती है चित्र। शुष्क मौसम में पत्तियों का गला हुआ भाग सूख जाता है और बाद में भूरा हो जाता है। तनों और पत्तियों के डण्ठलों पर हलके भूरे रंग के धब्बे बनते हैं जो लम्बाई में बढकर इसके चारों तरफ फैल जाते हैं। रोग के लिए वातावरण अनुकूल होने पर पूरा पौधा कुछ ही दिनों में मर जाता है। रोगग्रस्त और गल रहे पौधों से एक प्रकार की दुर्गन्ध आती है। दूर से ऐसा लगता है मानों फ़सल में आग लग गई हो।

रोगकारक : पिछेता ज़ुलसा रोग फ़ाइटोफ्थोरा इन्फेस्टांस से फैलता है। भारत में फ़ाइटोफ्थोरा इन्फेस्टांस के १०० से भी अधिक प्रभेद पहचाने गए हैं। यह फ़ाइकोमाईसेटी वर्ग की फ़फूंद है जिससे आलू, टमाटर तथा इसी प्रकार के सोलेनेसी वर्ग के पौधों पर रोग फैल सकता है। फ़ाइटोफ्थोरा इन्फेस्टांस के जैविकी के जीव समूह अंश को सूक्ष्म दर्शी यन्त्र से ही देखा जा सकता है। इस वर्ग के कवक जाल (माईसीलियम) की यह विशेषता है की इनके बीच सेप्टा नहीं होता। कवक जाल संक्रमित ऊतक की कोशिकाओं के बीच विकसित होता है। यह कवक हीट्रोथैलिक होती है अर्थात नर - मादा अलग अलग जगह पर उगते हैं। लैंगिक प्रजनन A1 व A2 दोनों प्रकार की लैंगिक किस्मों से होता है।

नियंत्रण : मेटालेक्सल नामक फफूंदनाशक इतना अधिक कारगर रहा की कुछ वर्षों में आलू के पिछेता झुलसा रोग के नियन्त्रण के लिए इसका प्रयोग विश्व भर में किया जाने लगा है. मेटालेक्सल प्रतिरोधी पी. इन्फेस्टांस के प्रभेद (आइसोलेट्स) भारत तथा विश्व के अन्य देशों में हैं। रोगकारकों में रोग प्रतिरोधिता विकसित न हो, इसलिए मेटालेक्सल का प्रयोग मैंकोजेब जेसे सम्पर्की फफूंदनाशकों के साथ मिलाकर किया जाता है।

२) सर्फोस्पोरा पर्ण धब्बे :

लक्षण : पत्तियों और तनों को प्रभावित करने वाला यह रोग सर्कोस्पोरा सोलानी ट्यूबरोसी से उत्पन्न होता है। आरम्भ में यह रोग निचली पत्तियों पर आता है तथा बाद में ऊपर की तरफ बढता है। रोग के कारण पत्तियों पर २ - ५ मिलीमीटर व्यास के भूरे धब्बे दिखाई देते हैं। प्रत्येक धब्बे का केन्द्र सफेदी लिए होता है। ये धब्बे गोल से बहुमुखी आकार के होते हैं। जो एक साथ मिलकर पत्ती के बहुत बड़े भाग में फैल जाते हैं। रोगग्रसित पत्तियां जल्दी मुरझाकर सूख जाती हैं। तनों पर आरम्भ में हल्के भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं जो बाद में काले हो जाते हैं। और नासूर की तरह दिखाई देते हैं। वैसे तो ये नासूर एक रेखीव होते हैं परन्तु कई बार ये २ - ४ सेंटीमीटर लम्बे से मसूराकार के भी हो सकते है।

रोग नियंत्रण : सर्कोस्पोरा से होने वाले पर्ण धब्बों पर नियंत्रण के लिए फ़सल में उर्वरकों का सन्तुलित इस्तेमाल करना आवश्यक है। मिट्टी में इस रोग का संचरण रोकने के लिए रोगी पौधों के तनों को फ़सल खुदाई से पहले काटकर या जल कर नष्ट कर देना चाहिए।

पिछेता झुलसा रोग के नियंत्रण के लिए समय - समय पर फफूंदनाशका का छिड़काव किया जाता है। बोर्डो मिश्रण (५:५:५०), मैंकोजेब २ किलोग्राम प्रति हैक्टर या कुछ अन्य फफूंद नाशकों जैसे डाइफोलेटान ४ एफ़ या ड्यूटर से छिड़काव से इस रोग के प्रभाव में कमी की जा सकती हे। लेकिन फफूंदनाशकों के छिड़काव से रोग पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं पाया जा सकता। उपरोक्त फफूंदनाशकों के छिड़काव से इन पर्ण धब्बों पर भी कुछ हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।

३) काली रूसी तथा तनावर्ण रोग : काली रूसी रोग से आमतौर पर काले रंग की अनियमित फफूंद की सख्त पपड़ी के पेचदार पिण्ड कन्दों पर चिपक जाते हैं ये अनियमित पिण्ड रोग कारकों के दृढ़ बीजाणु होते हैं जो धोने से आसानी से नहीं छूटते। इनका आकर सूई की नोंक से लेकर मटर के दानों तक के बराबर हो सकता है। इसके अतिरिक्त कन्दों का चटकना, विकृत होना, गड्ढ़े पड़ना, तने के निचले हिस्से का गलना आदि इसके अन्य लक्षण हैं। बिजाई के तुरन्त बाद फफूंद नए अंकुरों को अन्त: त्वचा से ग्रस्ति करती है जिससे भूमिगत अंकुरों पर भूरे गहरे रंग की क्षत या चोट जैसे निशान पड़ जाते हैं। क्षत या चोट के निशान पड़ने से ये भूमिगत अंकुर बढने से पहले ही नष्ट हो जाते हैं जिससे अंकुरण शत - प्रतिशत नहीं होता तथा खेत में पौधे दूर - दूर दिखाई देते हैं। तनावर्ण रोग के कारण तनों पर गेरूए - भूरे रंग वाले क्षत या चोट के निशान बन जाते हैं जो पूरे तने पर या तने के कुछ भाग पर घेरा डाल लेते हैं। पौधे का ऊपरी भाग गुलाबी या बैंगनी रंग का दिखाई देता हैं। धीरे - धीरे पौधे का ऊपरी भाग बदरंग हो जाता है तथा पत्तियां ऊपर की तरफ मुड़ने लगती हैं। ग्रसित पौधे में स्टार्च स्थानान्तरण के व्यवधान के कारण पत्तियों की धुरी पर वायुवीय कन्द निकल आते है। जमीन की सतह से कुछ ऊपर तनों पर सफ़ेद रंग की भूरी चटाई के सामान फफूंद विकसित हो जाती है। यह चटाईनुमा फफूंद जमीन के अन्दर तानों के क्षत या चोटिला स्थान पर जम जाती है। तने सफेद चूने जैसी फफूंद से ढके दिखाई देते हैं। जिसे आसानी से झाड़कर दूर किया जा सकता है। ऐसा फफूंद की पूर्ण अवस्था थेनेटेफोरस कुकुमेरिस द्वारा होता है।

रोग नियंत्रण या प्रबन्धन : रोग पर नियंत्रण पाने के लिए बेनोमिल, थिआबेन्डाजोल, कार्बोक्सिन, पेन्सीकुरॉन तथा फेनपीकलोनिल नामक फफूंदनाशक दवाओं का छिड़काव अधिक प्रभावी होता है। इसके अतिरिक्त रोग पर नियंत्रण के लिए ट्रिकोडर्मा विरिडी, ट्रिकोडर्मा हार्जियानम, बेसिलस सबटिलिस का प्रयोग भी किया जा सकता है।

४) चूर्णी खुरण्ड :

रोग लक्षण : इस रोग का प्रभाव पौधों के भूमिगत हिस्से तक ही सीमित रहता है। रोग की प्रारम्भिक अवस्था में कन्दों पर बैंगनी - भूरे रंग के भीगे हुई क्षत के निशान दिखाई देते हैं जो बाद में खुरण्ड का रूप धारण कर लेते हैं। साधारण खुरण्ड के विपरीत चूर्णी खुरण्ड रोग में क्षत के निशान गोल, उभरे हुए, चूर्णी बीजाणु से भरे हुए तथा छिलके (इपीडर्मिस ) के नष्ट हुए अवशेषों से घिरे हुए होते हैं। चूर्ण द्रव्य तथा बीजाणुओं के गोलों से फुन्सियां बनती हैं। बीजाणु के प्रत्येक गोले में अनेक बीजाणु होते हैं। ये बीजाणु एक दूसरे से भित्ती के साथ चिपके होते हैं। कुछ विशेष अवस्थाओं में इन पर मस्से जैसे उभार विकसित होते हैं। भण्डारण के दौरान रोगग्रसित कन्द सिकुड़ जाते हैं तथा शुष्क गलन जैसे लक्षण पैदा करते हैं। इन ग्रसित कन्दों के खुरण्ड पिछेता झुलसा और रोगकारक फफूंद आलू के मॉप - टॉप विषाणु को फैलाने में भी सहायक होते हैं।

रोग नियंत्रण : इस रोग के नियंत्रण के लिए रोगमुक्त क्षेत्र से बीज प्राप्त करके इस्तेमाल करना चाहिए। बीजोपचार इस रोग के नियंत्रण में अधिक नहीं पाया गया है। खेत में पानी निकासी की पूर्ण व्यवस्था होनी चाहिए तथा खेतों में पानी जमा नहीं होना चाहिए। इसके अतिरिक्त गैर - सोलेनासीयस फ़सलों का फ़सलचक्र अपनाने से भी रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

५) काला गलन :

लक्षण : रोग की शुरूआत में कन्दो के अंखुओं, वातरन्ध्रों और भूस्तारी तनों के शीर्ष भाग के चारों तरफ इस रोग के लक्षण दिखाई देते हैं। प्रभावित भागों की सतह पर गहरे हल्के भूरे रंग के नरम या पिलपिले पानी से भीगे क्षत के निशान दिखाई देते हैं। क्षत के भीतर खोखली जगह काली फफूंद या कवकजाल और रोगकारक की दृढपटली से भर जाती है। अन्य रोगकारक जीव इस प्रकार के क्षतों में। विशेषकर नमीयुक्त अवस्था में धावा बोल देते हैं जिससे काफी हानि होती है। कम नमी में क्षत सिकुड़ जाती है तथा खुदाई और भण्डारण के दौरान शुष्क गलन जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। फफूंद तनों को भी ग्रसित कर सकती है। इससे तनों पर झुलसा या काली मेखला रोग की जगह ही उथला गलन रोग दिखाई देता है जिससे पत्तियां मुरझा कर पीली पड़ जाती है.

रोग नियंत्रण : सोलानम चेकोंएस के कुछ पुंजका में काला गलन रोग प्रतिरोधिता पाई गई है जिनका उपयोग प्रतिरोधक किस्मों के प्रजनन के लिए किया जा सकता है। बैसिलस सबटिलिस जैसे जैव नियंत्रकों के उपचार से भी काला गलन रोग में कमी होती हैं।

अन्दरूनी गेरूए धब्बे : आलू के इस दैहिकी विकार से आलू के सम्पूर्ण भीतरी भाग में अनियमित आकर के गेरूए घब्बे या चित्तयां बन जाती हैं। आलुओं में होने वाली इस प्रकार की चित्तियों या धब्बों के कई वातावरणीय कारण हैं। जैसे कि कन्द आकर वृद्धि की अवधि में तापमान का अधिक होना, सिंचाई रोकना या पानी की कमी, या बढवार दर एक सामान न होना इत्यादि। कन्दों में कैल्शियम की कमी के कारण भी अन्दरूनी विकार होता है। विभिन्न किस्मों में घब्बे बनने की संभावनाएं अलग - अलग होती हैं। अत: किसी भी संकर प्रजाति को कई स्थानों पर सही विधि द्वारा परिक्षण करके ही इस कमी के होने या न होने का पता किया जा सकता है.

कन्दो में हरापन : उगते समय कन्दों का मिट्टी से बाहर होना और खुदाई के बाद खुले में कन्दों के रहने से सूर्य की रोशनी के कारण कन्द हरे हो जाते हैं। आरम्भ में यह हरापन आलू की सतह पर या निचली तरफ़ ही होता है जो धीरे - धीरे पूरे कन्द पर फैल जाता है। कन्दों में हरापन होने का कारण सोलानिन के स्तर में वृध्दि होना माना जाता है। हरेपन से कन्दों का सवाद कसैला हो जाता है तथा कन्द विषाक्त हो जाते है. अधिक हरे कन्द बाजार में बेचने लायक नहीं रहते क्योंकि विषाक्त होने के कारण ग्राहक इसे न तो पसन्द करते है और न ही खरीदते हैं।

किण्वक भूरापन : आलू में किण्वक भूरापन एक गंभीर समस्या है. आलू में किण्वक भूरापन होने से कन्दों की हानि तो होती ही है साथ ही ऐसे कन्दों की छंटाई करने पर अधिक श्रम तथा विधायन के दौरान किए गए बचाव उपायों पर लागत अधिक पड़ती है. आलुओं में भूरापन पोलीफिनोल ऑक्सीडेज द्वारा टायरोसिन तथा अन्य आर्थोहायड्रिक फिनोल के ऑक्सीकरण द्वारा होता है. टायरोसिन के ऑक्सीकरण के कारण गहरे या काले श्याम रंग का द्रव्य निकलता है। इसके नियन्त्रण के लिए प्रसंस्करणकर्त्ता कई रसायनों जैसे की चीलेटिंग कारकों, अवकारक कारकों, बाइ सल्फाईट या सल्फाईड्रील आदि यौगिकों का प्रयोग करते हैं।

वातावरणीय कारक भी किण्वक भूरेपन की मात्रा को प्रभावित करते हैं. इसके लिए कौन सा कारक उत्तरदायी है उसकी पर्याप्त जानकारी नहीं हैं। कई मामलों में वर्षा तथा कन्दों में टायरोसिन की मात्रा के बीच बेहतर संबंध पाया गया। जबकि कोई विशेष अनुवंशिकी कारक इसे प्रभावित नहीं करते हैं।

डॉ.बावसकर तकनिक का इस्तेमाल करने से दर्जेदार अधिक अस्सल उत्पादन पाने के लिए निम्नलिखित प्रयोग करे :

१) पहला छिड़काव: (आलू लगाने के २० से ३० दिन बाद) : जर्मिनेटर २५० मि.लि.+ थ्राइव्हर २५० मि.लि. + क्रॉंपशाईनर २५० मि.लि.+ प्रोटेक्टण्ट १०० ग्रॅम + प्रिझम २५० मि.लि. + हार्मोनी १५० मि.लि. इनके १०० लिटर पानीमें घोलका छिड़काव करें।

२) दूसरा छिड़काव: (आलू लगाने के ३० से ४० दिन बाद) : जर्मिनेटर २५० मि.लि.+ थ्राइव्हर ३५० मि.लि. + क्रॉंपशाईनर ३५० मि.लि.+ प्रोटेक्टण्ट २५० ग्रॅम + प्रिझम २५० मि.लि. + न्युट्राटोन १५० मि.लि. + हार्मोनी १५० मि.लि. १०० लिटर पानीमें घोल बनाके छिड़काव करे।

३) तिसरा छिड़काव: (आलू लगाने के ४० से ५० दिन बाद) : जर्मिनेटर ५०० मि.लि.+ थ्राइव्हर ६०० मि.लि. + क्रॉंपशाईनर ६०० मि.लि.+ प्रोटेक्टण्ट ५०० ग्रॅम + प्रिझम ५०० मि.लि. + न्युट्राटोन २५० मि.लि. + हार्मोनी २५० मि.लि. + १५० लिटर पानीमें घोल बनाके करे।


४) चौथा छिड़काव: (आलू लगाने के ६० दिन बाद) : जर्मिनेटर ५०० मि.लि.+ थ्राइव्हर ६०० मि.लि. + क्रॉंपशाईनर ६०० मि.लि.+ प्रोटेक्टण्ट ५०० ग्रॅम + प्रिझम ५०० मि.लि. + न्युट्राटोन ५०० मि.लि. + हार्मोनी २५० मि.लि. और पानी १५० लिटर में घोल बनाके छिड़कावके रूपमें दें।

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